प्राइस कट के बजाय पैकेट का वजन बढ़ाने पर नहीं चलेगा NAPA का डंडा

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प्राइस कट के बजाय पैकेट का वजन बढ़ाने पर नहीं चलेगा NAPA का डंडा :

नई दिल्ली : गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स में कमी के बाद संबंधित उत्पाद का दाम कम होना चाहिए या कंपनी पुराने दाम में उत्पाद की ज्यादा मात्रा दे तो ठीक रहेगा? जीएसटी के तहत मुनाफाखोरी पर लगाम कसने के लिए बनाई गई संस्था इसमें उलझना नहीं चाहती और वह सिर्फ यह पक्का करना चाहती है कि टैक्स कट का फायदा ग्राहक को मिले।

जिन एमएफसीजी कंपनियों ने दाम घटाने के बजाय अपने पैकेज्ड प्रॉडक्ट्स की क्वॉन्टिटी बढ़ा दी थी, वे राहत की सांस ले सकती हैं क्योंकि एंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी इसे इस रूप में देख सकती है कि कंज्यूमर को टैक्स कट का फायदा दिया गया। यह जानकारी अथॉरिटी के एक अधिकारी ने ईटी को दी।

इंडस्ट्री को यह चिंता सता रही थी कि नेशनल एंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी (NAPA) ने वजन में बढ़ोतरी को प्राइस कट के रूप में स्वीकार करेगी या नहीं।

एफएमसीजी सेगमेंट की कंपनियां मार्केट में डिमांड के अनुसार अलग-अलग मात्रा वाले पैकेज्ड प्रॉडक्ट्स पेश करती हैं और इनमें से कई ने पैकेट का दाम घटाने के बजाय उसमें उत्पाद की मात्रा बढ़ाई थी। उनका मानना था कि कंज्यूमर को फायदा पहुंचाने का यह ज्यादा सुविधाजनक तरीका है।

यह बात सैशे के मामले में ज्यादा प्रासंगिक है। अगर किसी चीज के एक रुपया वाले सैशे पर 28 पर्सेंट जीएसटी लगता था तो जीएसटी घटाकर 18 पर्सेंट किए जाने पर उसकी कीमत 92 पैसे रखी जाएगी। चूंकि दाम 92 पैसे रखना संभव नहीं है, लिहाजा कंपनियों ने दाम एक रुपया ही रखते हुए सैशे की सामग्री करीब 8 पर्सेंट बढ़ा दी ताकि टैक्स कट का फायदा दिया जा सके।

कंपनियां इसलिए भी प्राइस प्वाइंट नहीं बदलना चाहती हैं क्योंकि बाद में कभी दाम बढ़ाने पर उस प्रॉडक्ट से काफी लोग किनारा कर सकते हैं। लिहाजा वजन ही बढ़ाने को तरजीह दी जा रही है।

इस बात को लेकर भ्रम था कि वजन बढ़ाने से मुनाफाखोरी के आरोप से बचने में मदद मिलेगी या नहीं। इसकी वजह यह थी कि एंटी प्रॉफिटियरिंग के प्रावधानों में वजन में बदलाव पर कुछ नहीं कहा गया है।

अधिकारी ने कहा कि NAPA प्रचलित ट्रेड प्रैक्टिसेज पर भी गौर कर सकती है। उन्होंने कहा, ‘अथॉरिटी का काम कंज्यूमर के हितों की रक्षा करना है, लेकिन इसके लिए किसी को बेजा परेशान नहीं किया जा सकता है।’

अधिकारी ने कहा कि कंपनियों की जो भी बिजनेस प्रैक्टिस हो, उन्हें यह साबित करना होगा कि उन्होंने टैक्स कट का फायदा कंज्यूमर को दिया। उन्होंने कहा कि पैकेजिंग इस तरह होनी चाहिए कि वह लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट के प्रावधानों पर खरी उतरे।

इस एक्ट में पैकेज्ड प्रॉडक्ट्स के लिए प्राइस स्टिकर और क्वॉन्टिटी से जुड़ा फ्रेमवर्क दिया गया है।

टैक्स एक्सपर्ट्स ने कहा कि प्राइस घटाना व्यावहारिक विकल्प नहीं है और वजन में बढ़ोतरी उतनी होनी चाहिए, जो दाम में कमी के बराबर हो।

पीडब्ल्यूसी के इनडायरेक्ट टैक्स लीडर प्रतीक जैन ने कहा, ‘कई एफएमसीजी कंपनियों ने वजन बढ़ाकर कंज्यूमर्स को बेनेफिट दिया है क्योंकि कई मामलों में प्राइस घटाना व्यावहारिक नहीं था।’

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