जीएसटी में कमी का फायदा नहीं देने पर मैगी डीलर पर लगा जुर्माना

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नई दिल्ली : वस्तु एवं सेवा कर ( जीएसटी ) दरों में कटौती के फायदे ग्राहकों को नहीं देने के मामले में एक मैगी डीलर एंटी-प्रॉफिटीयरिंग जांच में फंस गया है। नैशनल एंटी-प्रॉफिटीयरिंग अथॉरिटी ने डीलर के खिलाफ मुनाफाखोरी के आरोप बरकरार रखे हैं। उसने कहा कि किस प्रॉडक्ट पर टैक्स कटौती का लाभ कंज्यूमर्स को पास करना है, यह तय करने का अधिकार डीलर के पास नहीं है।

अथॉरिटी ने पाया कि मैगी नूडल्स का 35 ग्राम का पैक, उसके 70 ग्राम के पैक से अलग है। इस बात की काफी संभावना है कि कंज्यूमर्स दोनों पैक एक साथ ना खरीदे। ऐसे में एक पैक पर कस्टमर को मिला फायदा, दूसरे पैक को खरीदने वाले कस्टमर को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। डीलर पर कुल 90,778 रुपये की मुनाफाखोरी का आरोप है। अथॉरिटी ने इस रकम को 18 पर्सेंट ब्याज के साथ कंज्यूमर वेलफेयर फंड में जमा करने का आदेश दिया है। इससे पहले अथॉरिटी मुनाफाखोरी के 2,253 रुपये को ब्याज के साथ आवेदक को वापस दिलवा चुकी है।

मैगी नूडल्स के एक रिटेलर ने शिकायत दर्ज कराई थी कि 15 नवंबर 2017 को जीएसटी रेट को घटाकर 18 पर्सेंट से घटाकर 12 पर्सेंट कर दिया गया था। इसके बाद प्रॉडक्ट के बेस प्राइस को बढ़ा दिया गया, जिससे मार्केट में उसकी पुरानी कीमत में कोई बदलाव नहीं आए।

हालांकि, डीलर ने अथॉरिटी को बताया कि 5 रुपये एमआरपी वाले मैगी पैक के फायदे को 12 रुपये एमआरपी वाले दूसरे पैक की कीमतों को घटाकर कंज्यूमर्स को पास किया गया है। डीलर ने यह भी बताया कि 12 रुपये एमआरपी वाले पैक की कीमत को 1 रुपये घटाया गया था, जो 5 रुपये और 10 रुपये वाले दोनों पैक पर मिलने वाले कुल फायदे से भी ज्यादा है। जीएसटी रेट में बदलाव के बाद दोनों पैक पर कंज्यूमर्स तक कुल 92 पैसे का फायदा पास होना चाहिए था। डीलर ने बताया कि फ्रैक्शनल प्राइसिंग के चलते लीगल टेंडर से जुड़े मामलों को देखते हुए इस तरह की कटौती की गई थी।

शिकायतकर्ता ने बाद में कंप्लेन वापस लेने की कोशिश की, लेकिन अथॉरिटी ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया कि इसकी जांच शुरू हो चुकी है। पीडब्ल्यूसी के नैशनल इनडायरेक्ट टैक्सेज लीडर, प्रतीक जैन ने बताया, ‘यह एक और आदेश है, जो कहता है कि जीएसटी दरों में कटौती से होने वाले फायदे को कंज्यूमर्स को पास करना होगा। यह फायदा प्रॉडक्ट की प्रत्येक यूनिट पर पास होना चाहिए, न कि एक प्रॉडक्ट या एंटिटी लेवल पर।’ जैन ने कहा कि अथॉरिटी ने लीगल टेंडर के मामले (फ्रैक्शनल प्राइसिंग) पर भी याचिका दिलचस्प तरीके से यह कहते हुए खारिज कर दी कि जरूरी लीगल टेंडर को देना कस्टमर का काम है और इसके आधार पर एक सप्लायर मुनाफाखोरी नहीं कर सकता है।

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